Saturday, October 4, 2008

इच्छाशक्ति

आंगन का छोटा या बड़ा होना
महत्त्वपूर्ण नहीं उनके लिए
जो आँगन के किसी कोने से
देखना चाहते हैं सूरज की रश्मियों को.
और वे जो करना नहीं चाहते यात्रा
apane आँगन की भी
जिन्हें उषा, सूरज,आँगन से कोई लेना-देना नही
वे करते हैं अक्सर कोशिश बेमानी सी
कैद करने की अपनी मुट्ठियों में
फूल के साथ-साथ फूल की सुगंध को भी
उन्हें शायद यह मालूम नही
jijeevisha छीन लेने पर
फूल तो दूर पत्तियां तक बगिया में अजन्मी रह जाएंगी
baanjh रह जाना होगा
पौधे के विनिर्माण की sari संभावनाओं को
और --- तब निस्पंद हो जाएँगे
समग्र 'सुन्दरम ' मेरे-तेरे ,उनके रसबोध भी ।
एकाकी 'शिव' या एकांगी 'सत्य '
तब समर्थ नही होंगे किसी भी शक्ति sambal से
'पारिजात' उगाने में किसी रस shoonya nandanvan में
शायद इसीलिये
अच्छा होगा यदि
फूल अपने गुलदान में सजाने के बजाय
टंगा रहने दिया जाय आँगन के गमले में
जिससे ,मैं ,तुम या वे न सही
कम से कम फूल तो सही
सूरज को इतना देख सके
समाहित हो जाय उसमें
जिजीविषा की उर्जा
की प्रवाहित हो सके उससे
सुगंध चर -अचर विश्व में ।
और
और अधिक अच्छा होगा यदि
मैं तुम या वे
तलाश लें ,अपने -अपने आँगन में
ऐसा कोई कोना
जहाँ से जगा सके हम
फूल के साथ-साथ
उषा के सूरज को देखने की इच्छाशक्ति ।
हाँ
इच्छाशक्ति के उस जागरण के लिए भी
आँगन के छोटे बड़े होने से कोई अन्तर नही पड़ता
यूँ भी
महत्त्वपूर्ण नही है आँगन का छोटा या बड़ा होना .

-विजय रंजन

Thursday, October 2, 2008

सफलता का मानदंड

मन बेचैन है ।
आज दिन है साबरमती के उस संत की जय बोलने का जिसने एक समय में
ज़माने को सकारात्मक ढंग से हिला दिया था .
इसी नाते ,मन से, बेमन से आज भी सभाओं ,गोष्ठियों, सरकारी प्रतिष्ठानों में उनकी
जैजैकार और व्याख्यान के दौर चल रहे हैं ।
(बतौर सरकारी ,कर्मचारिओं ,अफसरों के गैर सरकारी बयानात )गाँधी
छुट्टी के दिन भी परेशान करते हैं ।
गांधीवाद और गांधीगीरी पर वाद-विवाद तो कहीं ,बार्बे क्यू करते हुए,बोतल लिए हुए गांधी.
(लाल बहादुर शास्त्री का इतना नाम नहीं हुआ , बच गए कार्टून बनने से. )
बनते है मजाक ऐसे ही लोग जो कर देते हैं जीवन त्याग और तपस्या के नाम ?
अजीब सा लगता है
संदेश सारी ज़िन्दगी अहिंसा का ,स्वयं के जीवन का अंत हिंसा से ।
संदेश देश की अखंडता का ,एकता का और माध्यम /आरोपी बना देश बांटने का ।
आख़िर इन विरोधाभासों का कारन क्या है ?
हमारे समाज की संवेदन हीनता या ...
प्रश्न यह भी है , सफल व्यक्तित्व या फ़िर व्यक्ति की सफलता का मानदंड क्या हो?
व्यक्ति द्वारा स्थापित मूल्यों की चर्चा ,वाहवाह या उसके द्वारा स्थापित मूल्यों की प्रतिष्ठापना ?
उसके जीवन या उसके जीवन के बाद समाज द्वारा उन मूल्यों को अपनाया जाना ?
या फ़िर उन मूल्यों या सिद्धांतों का अपने आप में बड़ा होना ?
क्या गांधी एक सफल व्यक्तित्व ...





Wednesday, October 1, 2008

जया जादवानी की कविताएँ


कुहरे और धुंध की ओर

मुझे नहीं पता था एक दिन
मैं अपनी तलाश में
खो दूँगी अपने को ही
खो देता है राख होकर
कागज़ अपने आकार
मौन होकर प्रार्थनाएँ
खो देती हैं शब्द अपने
धीरे-धीरे रंग सारे जीवन के
बैठ जाते जल की सतह में खामोश
धुले हुए सफ़ेद चेहरे लिए
धीरे-धीरे जाती खाली नाव
उस पार
कुहरे और धुंध में लिपटी हुई
कुहरे और धुंध की ओर...


जगह

एक चिडिया रह सकती है एक पेड़ में
एक पेड़ में बहुत सी चिडियाएँ रह सकती हैं
जगहों के इरादे में है जगह
जब भी जाओ निकट उनके
सरक कर जगह दे देती हैं ...


मैं निर्वसना

ले गया कपडे सब मेरे
दूर बहुत दूर
काल बहती नदी में
मैं निर्वसना
तट पर
स्वप्न देखती देह का ।


समय

समय के माथे पर बिंदी
लगाती हूँ समय की
इस तरह शब्द एक रचती हूँ
रंग में धुलती हूँ समय के
इस तरह इसे पढ़ती हूँ
समय को रचना
समय ही हो जाना है
अंततः ...


सफ़ेद में सफ़ेद

जैसे पहचाना जा सकता है
नीले में नीला
पीले में पीला
लाल में लाल
ऐसे ही पहचान जाओगे मुझे
जब खींचोगे एक लकीर
सफ़ेद में सफ़ेद की .







आह्वान

विद्योत्तमा ,a silent creator lost into oblivion while कालिदास being celebrated world wide. BUT now all Vidyottamas have their voices heard whether Kalidasas
like it or not. Come and join the शास्त्रार्थ swatassukhay and lokhitay.

Monday, September 29, 2008

अर्जुन सिंह रोए क्यूँ


माँ के तीन रूप

बच्चे के लिए
माँ है उसकी अस्मिता
युवक के लिए
माँ है एक बोझिल रिश्ता
प्रौढ़ के लिए
माँ है औपचारिकता .

Sunday, September 28, 2008

नई लीक

ज़िंदगी और ज़माने की कशमकश से घबराकर
मुझसे मेरे लड़के पूछते हैं कि आप ने हमें पैदा क्यों किया ?
और मेरे पास इसके सिवा कोई जवाब नहीं है कि मेरे बाप ने भी मुझसे बिना पूछे मुझे पैदा किया था। मेरे पिता से बिना पूछे उनके पिता ने उन्हें पैदा किया था।
और मेरे बाबा से बिना पूछे उनके पिता जी ने
उन्हें...ज़िंदगी और ज़माने की कशमकश पहले भी थी और अब भी है।
शायद ज़्यादा। आगे भी होगी, शायद और ज़्यादा।
तुम नई लीक धरना।
अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।

हरिवंश राय बचन